Saturday, June 13, 2015

Piya ka chola

मैंने पिया का चोला ओढ़ लिया
मुझे होश नहीं अब दुनिया का
मैंने पिया का चोला ओढ़ लिया
मैं प्यासी बरखा सी बरसू, मैं पतझड़ में भी क्यों तरसूँ
आकाश में जितने तारे हैं मैं अपने आँचल में भर लूँ
मेरी धानी चुनरिया का आँचल मैंने हवा में बरबस छोड़ दिया
मैंने पिया का चोला ओढ़ लिया
सुनहरी धूप को ओढ़ के मैं बादल में छुपने जाती हूँ
इंद्रधनुष के रंगों से मैं चादर टांक के लाती हूँ
मेरे आँचल में हैं भरी हुयी अनगिनत बहारों की कलियाँ
मैंने पिया का चोला ओढ़ लिया
कभी रंग बिरंगे फूलों से अमृत रस बरसा करता है
मैंने छुप कर देखा मौसम को रंगों को तरसा करता है
मैंने फूलों की एक चादर को वादी के ऊपर छोड़ दिया
मैंने पिया का चोला ओढ़ लिया
वो सैयां मेरा मदमाता मैं बन गयी उसकी जोगनिया
कभी धूप धूप कभी छाओं सा वो उसमें मेरी पूरी दुनिया
उसके जादू में पागल हो मैं तो बन गयी हूँ बिरहनिया
मैंने पिया का चोला ओढ़ लिया
मेरे पिया के रंगीं चोले में दुनिया के रंग समाये हैं
बादल की अठखेली भी है सागर के रंगीं साये हैं
तारों की चूनर ओढ़ के रे मैं बनूँ रे उसकी बावरिया
मैंने पिया का चोला ओढ़ लिया
मुझे होश नहीं अब दुनिया का
मैंने पिया का चोला ओढ़ लिया

2 comments:

Sheesh said...

Bahut khoob.. Beenish jee.. Keep it up..

WhyYes 57 said...

Bahut Khoob! Apne apni baat baDi saadgi ke saath pur_asar andaaz mein kahi hai. Likhte rahiye aur apna takhleeqi safar jaari rakhiye..
ba_sad Khuloos