Sunday, February 26, 2017

Raat ki mahak

सुरमई सी रात है, हवा में बसी मालती
है बेले की नयी सुगंध, रजनीगंधा की लता हिली
कहीं गुलाब की महक, गुलमोहर की चटकी कली
महक उठी है आज वादी-ऐ-दिल की हर गली गली
वो चाँद आसमाँ से क्यों मुझे हैं यूँ पुकारता
ये किसकी धड़कनों की लै पे दिल मेरा है गाता
ये कौन दिल के तारों को है छुप के छेड़ जाता
बहक रही हूँ मैं यहाँ कैसी है ये बेकली
हवा में उसकी आहटें बेचैन कर रही हैं यूँ
वो जैसे दिल के पास है महसूस हो रहा है क्यों
मैं जानती नहीं उसे मगर है मेरे साथ वो
तड़प रही हूँ रात दिन है कैसी मेरी बेबसी

Zindagi

ज़िन्दगी तेरा हर रंग हमने देखा है
सुनहरी सुबहें हमने देखी हैं
सांझ का स्याह रंग देखा है

कभी देखा है तुझको फूलों में
खिलते और मुस्कुराते हुए
कभी बनके उफान नदिया की
तुझे देखा है बल खाते हुए

सुबह के रूप में मिली है कभी
कभी करके सिंगार आयी है
कभी तू सांझ की दुल्हन बनके
मेरे संग मिलके मुस्कुरायी है

कभी तू मांग में सिन्दूर भरे
मुख पे सूरज सजा के मिलती है
कभी जुगनू के जैसी जगमग सी
मुझको हर राह पर तू दिखती है

कभी तू ऐसे मुझको मिलती है
किसी मासूम सी हंसी में घुली
जैसे बहार में हो इठलाती
खिलती जाती हुई एक नन्ही कली

फिर तू एक रंग और लाती है
बनके चन्दा सी जगमगाती है
सुरमयी रात के सितारों सी
सांझ के साये में ढल जाती है

तेरा हर रूप है जुदा सबसे
तेरा हर रूप हमने देखा है
 जब भी देखा है आईने में
ज़िन्दगी हमने तुझको देखा है